पूर्वांचल में आज मनाया जा रहा है सतुआन, जानें क्यों इस दिन सत्तू खाना माना जाता है शुभ
Significance of eating Sattu : भारत त्योहारों का देश है, जहाँ हर ऋतु का स्वागत एक विशेष पर्व के साथ किया जाता है. एक तरफ जहां पंजाब बैसाखी की धूम है, वहीं उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल(Purvanchal Culture and Traditions), बिहार और झारखंड के इलाकों में आज(14 अप्रैल) ‘सतुआन’ या ‘सतुआनी'(Satuan Sankranti 2026) का पर्व पूरे उत्साह के साथ मनाया जा रहा है. यह पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान मात्र नहीं है, बल्कि यह प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने और बदलते मौसम के अनुकूल खुद को ढालने का एक जीवंत संदेश भी है.
क्या है सतुआन और मेष संक्रांति?
हिंदू पंचांग के अनुसार, जब सूर्य मीन राशि से निकलकर मेष राशि में प्रवेश करते हैं, तो इसे ‘मेष संक्रांति’ कहा जाता है. सौर वर्ष की गणना के अनुसार, इसी दिन से नए साल की शुरुआत भी मानी जाती है. पूर्वांचल में इसे ‘सतुआन’ के नाम से पुकारा जाता है क्योंकि इस दिन ‘सत्तू’ (भुने हुए अनाज का आटा) का महत्व सर्वोपरि हो जाता है. आज के दिन से ही खरमास समाप्त होता है और मांगलिक कार्यों की शुरुआत हो जाती है.
सत्तू खाने की है मुख्य परंपरा
सतुआन के दिन सत्तू खाने की परंपरा सदियों पुरानी है. सुबह स्नान-ध्यान के बाद लोग अपने इष्ट देव और पितरों को सत्तू अर्पित करते हैं. पूर्वांचल के घरों में आज चने, जौ और मकई के सत्तू को विशेष तरीके से तैयार किया जाता है. इसे खाने का तरीका भी खास है- कोई इसे गुड़ के साथ मीठा करके खाता है, तो कोई नमक, हरी मिर्च, प्याज और आम के अचार या कच्चे आम (टिकोरे) की चटनी के साथ इसका आनंद लेता है. मान्यता है कि आज के दिन सत्तू का सेवन करने से साल भर शरीर ऊर्जावान बना रहता है.
दान का विशेष महत्व
सतुआन पर दान को ‘अक्षय पुण्य’ देने वाला माना गया है. चूकि यह पर्व भीषण गर्मी की शुरुआत के समय आता है, इसलिए दान की वस्तुएं भी शीतलता प्रदान करने वाली होती हैं. आज के दिन पानी से भरा मिट्टी का घड़ा (कलश) दान करना सबसे बड़ा पुण्य माना जाता है. यह प्यासे को जल पिलाने के परोपकारी भाव को दर्शाता है. जबकि जरूरतमंदों को सत्तू और गुड़ का दान किया जाता है. इसके अलावा, हाथ से झलने वाले बांस के पंखों का दान भी इस दिन की एक अनिवार्य परंपरा है.
वैज्ञानिक और स्वास्थ्य पहलू
सत्तू को ‘भारतीय सुपरफूड’ कहा जाता है. वैज्ञानिक दृष्टिकोण से, सत्तू की तासीर ठंडी होती है और इसमें फाइबर व प्रोटीन भरपूर मात्रा में होता है.
तापमान नियंत्रण: वैशाख की शुरुआत के साथ ही लू (गर्म हवाएं) चलने लगती हैं. सत्तू का सेवन शरीर के आंतरिक तापमान को स्थिर रखता है.
पाचन क्रिया: यह हल्का होता है और आसानी से पच जाता है, जिससे गर्मी के दिनों में होने वाली पेट की समस्याओं से बचाव होता है.
लोक संस्कृति और उत्सव
वाराणसी, गोरखपुर, देवरिया, बलिया और आजमगढ़ जैसे जिलों में इस दिन मेलों जैसा माहौल होता है. नदियों के किनारे विशेष स्नान और घाटों पर सत्तू के दान का दृश्य मनमोहक होता है. किसान अपनी नई फसल (रबी की फसल) के कटने की खुशी में भी यह त्योहार मनाते हैं, क्योंकि सत्तू ताजी फसलों से ही तैयार किया जाता है.
सतुआन संक्रांति का यह पर्व हमें सिखाता है कि मनुष्य और प्रकृति के बीच का संतुलन कितना गहरा है. यह सादगी का पर्व है, जो हमें अपनी जड़ों से जोड़ता है. आज के आधुनिक दौर में, जहाँ पैकेट बंद और प्रोसेस्ड फूड का बोलबाला है, ‘सतुआन’ जैसा पर्व हमें फिर से हमारे पारंपरिक और पौष्टिक आहार ‘सत्तू’ की ओर लौटने का संदेश देता है.